आरा। लोकसभा के बजट सत्र के दौरान सांसद सुदामा प्रसाद ने केंद्र सरकार द्वारा लागू चार श्रम कोडों और मनरेगा के मुद्दे पर जोरदार वक्तव्य दिया। उन्होंने चारों श्रम कोडों का विरोध करते हुए इन्हें “भारत के श्रमिकों की गुलामी का दस्तावेज” करार दिया।
संसद में बोलते हुए सुदामा प्रसाद ने कहा कि वह चार श्रम कोड के खिलाफ अपनी बात रखने के लिए खड़े हुए हैं। उनके अनुसार यह कानून मजदूरों के शोषण और उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कानूनों के जरिए पूंजीपतियों के हाथ में मजदूरों के खिलाफ “कोड़ा थमा दिया गया है”, जिससे श्रमिकों के अधिकार कमजोर होंगे।
सांसद ने दावा किया कि देशभर में करोड़ों किसान और मजदूर चार श्रम कोड के विरोध तथा मनरेगा के पुराने प्रावधानों की बहाली की मांग को लेकर सड़कों पर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को मजदूरों और किसानों की मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि “देश को चलाने में श्रमिकों की सबसे बड़ी भूमिका है।”
यूनियन और हड़ताल के अधिकार पर सवाल
सुदामा प्रसाद ने कहा कि पहले 10 या 100 मजदूरों की संख्या पर यूनियन बनाने का अधिकार था, जिसे अब 300 या 51 प्रतिशत कर्मचारियों की शर्त से जोड़ दिया गया है। उनके अनुसार इससे श्रमिकों के संगठनात्मक अधिकार सीमित होंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि पहले हड़ताल के लिए दो सप्ताह का नोटिस देना होता था, जिसे बढ़ाकर दो महीने कर दिया गया है। इससे मजदूरों के आंदोलन के अधिकार पर अंकुश लगेगा।
न्यूनतम मजदूरी और भुगतान प्रणाली पर आपत्ति
सांसद ने आरोप लगाया कि नए श्रम कोड में न्यूनतम मजदूरी का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा कि मजदूरी भुगतान की प्रणाली को मासिक या दैनिक के बजाय प्रति घंटा आधार पर करने का प्रावधान श्रमिकों के हितों के खिलाफ हो सकता है।
उन्होंने कहा कि सरकार मजदूरों को “लिखो-फेंको” की नीति के तहत अस्थायी रोजगार की ओर धकेल रही है, जिससे उनकी नौकरी की सुरक्षा कमजोर होगी।
ग्रामीण मजदूर भी आंदोलन में
सुदामा प्रसाद ने कहा कि इस आंदोलन में ग्रामीण मजदूर भी शामिल हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि चारों श्रम कोड वापस लिए जाएं और मनरेगा के पुराने प्रावधानों को बहाल किया जाए। साथ ही उन्होंने श्रमिकों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने की अपील की।